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New Labour Code Impact on Salary: नए लेबर कोड का सीधा असर होगा आपकी सैलरी पर, जानिए घटेगी या बढ़ेगी!

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असल न्यूज़: केन्द्रीय श्रम एवं रोजगार कल्याण मंत्रालय (Ministry of Labour and Employment) ने 4 श्रम संहिताओं यानी लेबर कोड Labour Codes के तहत नियमों को अंतिम रूप दे दिया है। इन चारों संहिताओं को राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद अधिसूचित किया जा चुका है। लेकिन इन्हें अमल में लाने के लिए नियमों को भी नोटिफाई किए जाने की जरूरत है। अगर सरकार वेज की नई परिभाषा को लागू करती है तो पीएफ कंट्रीब्यूशन बढ़ जाएगा। पहले पीएफ केवल बेसिक सैलरी, डीए और अन्य स्पेशल भत्तों पर कैलकुलेट किया जाता था। नए नियम के तहत तमाम भत्ते कुल सैलरी (salary structure) के 50 फीसदी से अधिक नहीं हो सकते हैं। यानी कि अप्रैल 2021 से कुल सैलरी में बेसिक सैलरी (Basic salary) का हिस्सा 50 फीसदी या फिर उससे भी अधिक रखना होगा। ये नया वेज रूल आने के बाद सैलरी स्ट्रक्चर में बड़ा बदलाव (New labour code affect on in hand salary) देखने को मिलेगा।

1 क्या है मौजूदा सैलरी स्ट्रक्चर?
अमूमन भारत में सभी इंडस्ट्रीज में Compensation structure में बेसिक सैलरी और अलॉवेंस शामिल होते हैं। बेसिक सैलरी ग्रॉस की 30 से 50 फीसदी होती है। नए नियम के मुताबिक हर कंपनी को सैलरी स्ट्रक्चर में बदलाव करना होगा, ताकि बेसिक सैलरी सीटीसी का 50 फीसदी हो जाए और बाकी के सब अलाउंस बची हुई 50 फीसदी सैलरी में रहें।

2 पीएफ कॉन्ट्रिब्यूशन पर क्या होगा असर?
नए नियम के तहत बेसिक सैलरी कुल सीटीसी की कम से कम 50 फीसदी होगी। प्रोविडेंट फंड की गणना बेसिक सैलरी पर ही की जाती है। ऐसे में कर्मचारी का पीएफ कॉन्ट्रिब्यूशन बढ़ जाएगा। इसकी वजह से नियोक्ता का भी पीएफ में योगदान बढ़ेगा।

3 इन हैंड सैलरी पर क्या होगा असर?
नए वेज रूल के तहत पीएफ में कॉन्ट्रिब्यूशन बढ़ जाएगा, जिसकी वजह से इन हैंड सैलरी में कमी हो जाएगी। हालांकि, आपको रिटायरमेंट के बाद फायदा मिलेगा, क्योंकि ग्रेच्युटी बढ़ जाएगी, जो बेसिक सैलरी पर कैल्कुलेट की जाती है।

4 कितना बढ़ेगा बोझ?
अगर किसी कंपनी की बेसिक सैलरी कुल कंपनसेशन का 20 से 30 फीसदी है तो उसका वेज बिल 6 से 10 फीसदी तक बढ़ जाएगा। जिन कंपनियों में बेसिक सैलरी ग्रॉस का 40 फीसदी है, उनका वेज बिल 3 से 4 फीसदी बढ़ेगा।

5 ग्रेच्युटी देना होगा जरूरी?
अगर बेसिक पे और ग्रॉस का रेश्यो 30 फीसदी के आसपास है और वेज कोड लागू होने के बाद इसे बढ़ाकर 60 फीसदी किया जा सकता है। ऐसे में कंपनियों पर दोगुना बोझ पड़ सकता है। साथ ही फिक्स्ड टर्म वाले कर्मचारियों को गेच्युटी देनी होगी, चाहे वो 5 साल की नौकरी पूरी करें या नहीं। नए कोड से कर्मचारी हर साल के अंत में लीव एनकैशमेंट की सुविधा ले सकता है।

6 कितना बढ़ेगा कंपनी का बिल?
फिक्स्ड टर्म वाले कर्मचारियों पर खर्च बढ़ जाएगा, क्योंकि ग्रेच्युटी अनिवार्य हो जाएगी। हाई सैलरी और मिड सैलरी ग्रुप में कम बोझ पड़ेगा, लेकिन लोअर सैलरी रेंज ग्रुप में कंपनी का खर्च 25 से 30 फीसदी बढ़ जाएगा। उन्होंने कहा कि इससे इस साल इंक्रिमेंट प्रभावित हो सकता है।

7 कितने लेबर कानूनों से बनाए हैं ये 4 कोड?
सरकार ने 29 केंद्रीय लेबर कानूनों को मिलाकर 4 नए कोड बनाए हैं जिनमें वेज और सोशल सिक्योरिटी के कोड भी शामिल हैं। Nishith Desai Associates में हेड (HR Laws) विक्रम श्रॉफ ने कहा कि लेबर कोड्स में कुछ नए कॉन्सेप्ट लाए गए हैं लेकिन सबसे बड़ा बदलाव यह है कि वेज की परिभाषा का विस्तार किया गया है। उन्होंने कहा, यह परिभाषा चारों लेबर कोड्स में एक ही तरह की है। इसका वर्कर्स और एम्पलॉयर पर व्यापक असर होगा। इससे कर्मचारी के हाथ में आने वाली सैलरी पर भारी असर हो सकता है।

8 वेज की नई परिभाषा क्या है?
नए कोड्स में बेसिक पे, डीए, रीटेनिंग और स्पेशल भत्तों को वेज में शामिल किया गया है। एचआरए, कनवेंस, बोनस, ओवरटाइम अलावेंस और कमीशंस को इससे बाहर रखा गया है। नए नियम के तहत तमाम भत्ते कुल सैलरी के 50 फीसदी से अधिक नहीं हो सकते हैं। अगर यह 50 फीसदी से अधिक होते हैं तो ज्यादा राशि को वेज का हिस्सा माना जाएगा। उदाहरण के लिए पहले ग्रेच्युटी की गणना मूल वेतन यानी बेसिक सैलरी के हिसाब से होती थी लेकिन अब यह वेज के हिसाब से मिलेगी। इससे एम्पलॉयी की पे बढ़ सकती है और एम्पलॉयर का खर्च बढ़ जाएगा।

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