Home Lifestyle अब आंदोलनकारी किसानों से बात नहीं : कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर

अब आंदोलनकारी किसानों से बात नहीं : कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर

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असल न्यूज़: कृषि कानूनों के खिलाफ करीब चार महीने से जारी किसानों के आंदोलन को लेकर केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने शनिवार को कहा कि हजारों किसान संगठन, अर्थशास्त्री, समाज के विभिन्न वर्ग कृषि सुधार बिलों का स्वागत कर रहे हैं। कुछ लोग इसका विरोध कर रहे हैं। आंदोलनकारी किसानों से सरकार ने 11 दौर की बातचीत की, हमने उन्हें बिल में संशोधन का प्रस्ताव दिया, लेकिन किसान यूनियनों ने प्रस्ताव को ठुकरा दिया।

कृषि मंत्री तोमर ने कहा कि किसानों के मन में असंतोष नहीं है। जो किसान संगठन इन बिलों के विरोध में हैं सरकार उनसे बातचीत के लिए तैयार है। मैं किसान संगठनों से आग्रह करूंगा कि वे अपना आंदोलन स्थगित करें और अगर वे बातचीत के लिए आएंगे तो सरकार उनसे बातचीत के लिए तैयार है।

तोमर ने कहा कि COVID-19 के मद्देनजर मैंने कई बार किसान नेताओं से बच्चों और वृद्धों को घर वापस जाने के लिए कहने का आग्रह किया था। अब दूसरी लहर शुरू हो गई है, किसानों और उनकी यूनियनों को COVID प्रोटोकॉल का पालन करना चाहिए। उन्हें विरोध स्थगित करना चाहिए और हमारे साथ वार्ता करनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि हमने कानून के समस्याग्रस्त क्षेत्रों पर चर्चा करने और उनमें संशोधन करने की पेशकश की। किसान यूनियनों ने इस स्वीकार नहीं किया और कोई कारण भी नहीं बताया। जब सरकार बातचीत के लिए तैयार नहीं होती है या जब यूनियनों को अनुकूल प्रतिक्रिया नहीं मिलती है तो आंदोलन जारी रहता है। यहां यूनियनों ने इसे वैसे भी जारी रखने का फैसला किया है।

26 नवंबर से दिल्ली की सीमाओं पर प्रदर्शन कर रहे हैं किसान

गौरतलब है कि नए कृषि कानूनों के खिलाफ बीते साल 26 नवंबर से हजारों की तादाद में किसान दिल्ली और हरियाणा की सीमाओं पर प्रदर्शन कर रहे हैं। इन कृषि कानूनों को रद्द कराने पर अड़े किसान इस मुद्दे पर सरकार के साथ आर-पार की लड़ाई का ऐलान कर चुके हैं। किसानों ने सरकार से जल्द उनकी मांगें मानने की अपील की है। वहीं सरकार की तरफ से यह साफ कर दिया गया है कि कानून वापस नहीं होगा, लेकिन संशोधन संभव है।

कृषि कानूनों पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त कमेटी ने रिपोर्ट सौंपी

तीन नए विवादास्पद कृषि कानूनों का अध्ययन करने के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त कमेटी ने अपनी रिपोर्ट 19 मार्च को एक सीलबंद लिफाफे में सुप्रीम कोर्ट को सौंप दी है। सुप्रीम कोर्ट ने 11 जनवरी को इन तीनों कानूनों के क्रियान्वयन पर अगले आदेशों तक रोक लगा दी थी और गतिरोध का समाधान करने के लिए चार सदस्यीय कमेटी नियुक्त की थी। कमेटी को कानूनों का अध्ययन करने और सभी हितधारकों से चर्चा करने के लिए दो महीने का समय दिया गया था।

कमेटी के सदस्यों में से एक पी.के. मिश्रा ने कहा कि हमने 19 मार्च को एक सीलबंद लिफाफे में रिपोर्ट सौंप दी है। अब, अदालत भविष्य की कार्रवाई पर फैसला करेगी। कमेटी की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, कमेटी ने किसान संगठनो, किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) की खरीद एजेंसियों, पेशेवरों, शिक्षाविदों, निजी और साथ ही राज्य कृषि विपणन बोर्डों सहित विभिन्न हितधारकों के साथ विचार-विमर्श के कुल 12 दौर किए।

कमेटी ने रिपोर्ट को अंतिम रूप देने से पहले नौ आंतरिक बैठकें भी कीं। मिश्रा के अलावा कमेटी के अन्य सदस्यों में शेतकारी संगठन के अध्यक्ष अनिल घनवत और कृषि अर्थशास्त्री तथा कृषि लागत एवं मूल्य आयोग के पूर्व अध्यक्ष अशोक गुलाटी शामिल हैं। कमेटी के चौथे सदस्य भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष भूपिन्दर सिंह मान ने काम शुरू करने से पहले ही कमेटी से खुद को अलग कर लिया था।

बता दें कि किसान हाल ही बनाए गए तीन नए कृषि कानूनों – द प्रोड्यूसर्स ट्रेड एंड कॉमर्स (प्रमोशन एंड फैसिलिटेशन) एक्ट, 2020, द फार्मर्स ( एम्पावरमेंट एंड प्रोटेक्शन) एग्रीमेंट ऑन प्राइस एश्योरेंस एंड फार्म सर्विसेज एक्ट, 2020 और द एसेंशियल कमोडिटीज (एमेंडमेंट) एक्ट, 2020 का विरोध कर रहे हैं। केन्द्र सरकार सितम्बर में पारित किए तीन नए कृषि कानूनों को कृषि क्षेत्र में बड़े सुधार के तौर पर पेश कर रही है, वहीं प्रदर्शन कर रहे किसानों ने आशंका जताई है कि नए कानूनों से एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) और मंडी व्यवस्था खत्म हो जाएगी और वे बड़े कॉरपोरेट पर निर्भर हो जाएंगे।

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