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BJP की हार के बाद भी पार्टी में मोदी को चैलेंज करने वाला कोई नहीं, RSS भी मजबूरी में करता रहेगा सहयोग

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2 मई का दिन भारत के चुनावी इतिहास में दर्ज हो गया। देश में जब-जब चुनाव होंगे तब इस बात पर चर्चा होगी कि कैसे एक महिला नेता ने अकेले ही मोर्चा संभालते हुए एक बहुत ही कठिन चुनाव जीतकर देश के सबसे मजबूत राष्ट्रीय नेता और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को राजनीति बिसात पर मात दे दी।

भारतीय लोकशाही ने दिखा दिया कि भारतीय मतदाता कितने चतुर हैं। मतदाता तो पांच राज्यों में बिखरे हुए थे लेकिन सब ने मिलकर एक नया राष्ट्रीय राजनैतिक संतुलन बना डाला।

1- नंदीग्राम से 2000 से कम मत से हारने के बावजूद ममता बनर्जी ने इतिहास बना दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह सबसे ताकतवर राजनेता माने जाते हैं। मोदी और शाह को उन्हीं की बिछाई हुई शतरंज में शह देने वाली ममता उनको हराते-हराते कई पाठ सिखा गईं। दिल्ली की सल्तनत का गुरूर चूर-चूर करने वाली ममता आज नई ऊंचाइयों को छू गई हैं।

भारत की संघीय व्यवस्था की नींव इतनी मजबूत है कि प्रांतीय नेता चुनाव के द्वारा राष्ट्रीय नेता को पछाड़ सकता है और वो भी मोदी-शाह जैसे मजबूत नेताओं को। यह भारतीय प्रजातंत्र का अद्भुत क्षण है। कोविड की दूसरी लहर के बाद प्रभावित इलाकों में मेडिकल व्यवस्था ध्वस्त होने आई है उसके कारण मोदी और उनकी सरकार की छवि को गंभीर क्षति पहुंची है। इसके बाद जो कुछ बचा था उसको ममता की जीत और नुकसान पहुंचाएगी।

ममता का एक महिला नेता होने के नाते इस जीत का महत्व भारतीय समाज के लिए कुछ और ही बढ़ जाता है। ममता की जीत धर्मनिरपेक्ष लोगों के भाजपा के खिलाफ मोर्चे को भी नई ताकत देगी। ममता आज विपक्ष के सभी नेताओं में सबसे आगे निकल गई हैं। शरद पवार जैसे नेता ने ये बात समझते हुए सबसे पहले ममता को बधाई दी।

ममता बनर्जी की जीत सभी वर्गों और सभी प्रकार के मतदाताओं के सहयोग से हुई है, लेकिन मुस्लिम मतदाताओं ने स्ट्रैटजिक मतदान करके उनको 200 के पार पहुंचा दिया। इतना स्पष्ट हो रहा है कि मुस्लिम मतों का विभाजन नहीं हुआ और वो भाजपा को हराने के लिए ममता के साथ दम लगाकर खड़े रहे। भाजपा के आक्रामक और विभाजनकारी प्रचार से नाराज बंगाली भद्रलोक ने भी ममता का साथ नहीं छोड़ा। बंगाल के शहरों ने भाजपा से दूरी बनाए रखी। ममता सरकार की महिलाओं के लिए जो योजनाएं हैं, उससे प्रभावित होकर महिला मतदाताओं ने भी ममता का साथ बनाए रखा।

2- इस जीत के साथ ममता ने मोदी और शाह के अभिमान को मात जरूर दी है, लेकिन भाजपा को या उनकी विचारधारा को बंगाल में सशक्त प्रवेश से नहीं रोक सकी हैं। बंगाल का ये इलेक्शन गजब का इलेक्शन है जिसमें ममता ने जीत हासिल की है लेकिन बीजेपी की ग्रोथ भी नाटकीय रही है। बीजेपी का परफॉर्मेंस तीन सीटों से लेकर 80 के करीब पहुंचना कोई कम सफलता नहीं है। अगर बीजेपी ने अपना सब कुछ दांव पर न लगाया होता और एक नॉर्मल चुनाव लड़ा होता तो वो भी आज आंशिक सफलता का दावा कर सकती थी।

इस एक ही चुनाव से अगर ममता ने इतिहास लिखा है तो भाजपा ने भी एक नया अध्याय शुरू किया है जिसे बंगाल या भारत नजर अंदाज नहीं कर सकता है। समय के दायरे में अगर देखा जाए तो किसने सोचा था 2004 की भाजपा 2014 में लोकसभा में पूर्ण बहुमत लाकर इतिहास बनाएगी। कुछ ऐसे ही बीजेपी ने बंगाल में पहला लेकिन ठोस कदम रखा है। ममता की आंधी में कांग्रेस, लेफ्ट पार्टी और मुस्लिम समुदाय के वोट बंटोरने खड़ी हुई पार्टी बिलकुल साफ हो गए। दिल्ली के चुनाव में कांग्रेस के ढह जाने के कारण केजरीवाल 67 सीटें ले गए थे। कुछ इसी तरह ममता बनर्जी ने भाजपा को हरा दिया। जब वोटों का बंटवारा नहीं होता है तो भाजपा सेक्युलर ताकतों के सामने कमजोर हो जाती है।

भाजपा ने इस चुनाव को क्लास वॉर यानी गरीब और अमीर के खिलाफ की राजकीय लड़ाई बताया था। बीजेपी ने कहा था कि शहर और गांव का बंगाल अलग-अलग है। भाजपा का कहना था कि पिछड़े और अतिपिछड़े वर्ग और दलित और गरीब लोग इस बार भाजपा को वोट देंगे। भाजपा की मंडल नीति शायद भाजपा की आबरू आज बचा पाई, लेकिन कमंडल नीति का असर उल्टा हुआ और मुस्लिम समुदाय ने ममता को सर आंखों पर उठा लिया।

भाजपा को डर तो था कि सुसंस्कृत भद्रलोक और शहर के मध्यम वर्ग और मुस्लिम समुदाय ममता के साथ जा सकता है। बंगाल का प्रेसिडेंसी इलाका जिसमें कोलकाता शहर भी आ जाता है, तृणमूल को 92 सीटें मिली हैं, जबकि भाजपा को 16 सीटें मिली हैं, यह स्पष्ट करता है बंगाल के पढ़े लिखे और कला-संगीत के चाहने वालों ने भाजपा को ठुकरा दिया है और मोदी-शाह की आक्रामक राजनीति को बंगाल में चलने नहीं दिया। नतीजों से यह स्पष्ट हो गया कि ये वर्ग भाजपा को अब तक बाहरी पार्टी मान रहा है।

3- तमिलनाडु में डीएमके नेता स्टालिन का जीतना, केरेला में सीपीएम के नेता पिनराई विजयन का जीतना और बंगाल में ममता का जीतना भारत की प्रांतीय पार्टियों की ताकत बता रहा है। डबल इंजन की सरकार के फायदे की भाजपा की दलील भारतीय मतदाता को स्वीकार्य नहीं है। ममता की शानदार जीत और केरल में कांग्रेस की हार का नुकसान आगे चल के राहुल गांधी और कांग्रेस को कितना होगा उसका अंदाजा लेना भी जरूरी है।

अब सवाल ये है कि क्या नरेंद्र मोदी की स्थिति में इससे कोई फर्क आने वाला है?
ये तो जरूर है कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह के अहम को ममता की जीत ने धक्का जरूर पहुंचाया है, लेकिन उनकी राजनैतिक ताकत को बड़ा चैलेंज ममता तभी दे सकती हैं जब राज्य के बाहर अपनी छवि बनाने के लिए पूरी ताकत के साथ मैदान में आएं। प्रांतीय नेता से राष्ट्रीय नेता बनने के लिए उनके पास 3 साल का समय है।

ममता अगर गंभीरता से मोदी को चैलेंज देना चाहती हैं तो उसका साथ कांग्रेस कैसे देगी वो गंभीर सवाल है। नरेंद्र मोदी की राजनीति कुछ ऐसी है कि बहुत सारी पार्टियों का जमावड़ा उनके खिलाफ कैसे सशक्त चैलेंज दे सकता है वो एक सवाल है। ममता की जीत के पीछे उनको सलाह देने वाले प्रशांत किशोर ने भी आज टीवी पर कहा मोदी के सामने एक सशक्त नेता ही खड़ा होना चाहिए जिसके पीछे भाजपा विरोधी ताकत एक होकर खड़ी हो जाएं।

उस हिसाब से नरेंद्र मोदी से ज्यादा तो राहुल गांधी को ममता की महत्त्वाकांक्षा से चिंता करने की जरूरत है। राहुल गांधी और कांग्रेस दोनों को इस चुनावों में जबरदस्त धक्का लगा है। केरल में हुई हार से कांग्रेस को लगा धक्का ज्यादा जोर का है। भाजपा को बंगाल में धक्का लगा है, लेकिन उनके भविष्य का एक मार्ग भी खुला है।

दूसरा, बंगाल हारने के बावजूद भाजपा में कोई आंतरिक गतिविधि दिखाई नहीं दे रही है जो मोदी को चैलेंज करे। बंगाल की हार अमित शाह पर जरूर असर करेगी, क्योंकि चुनाव प्रचार के दरम्यान मतों का ध्रुवीकरण करने की उनकी पॉलिसी फिर से एक बार गलत साबित हुई है। हिंदू मतों का ध्रुवीकरण करते-करते मुस्लिम मतों का एकीकरण ममता के पक्ष में हो गया।

जय श्रीराम का नारा कई स्तरों पर काम कर गया, लेकिन भाजपा ने जैसे चाहा था वैसा नहीं। भाजपा ने चाहा था यह नारा उससे कुछ उल्टा ही असर कर गया। भाजपा की कोई भी चुनावी लड़ाई चुनाव क्षेत्र में मुसलमान मतों को छोड़ने के बाद शुरू होती है, ये चुनावी राजनीति कितनी चलेगी, कैसे चलेगी उस पर भाजपा को विचार करने का समय आ गया है। लेकिन एक दलील ये भी आगे आ सकती है कि अमित शाह की बिछाई शतरंज के चाल पर भाजपा असम जीत गई है। संघ परिवार और बीजेपी के मजबूत नेता ये भी सोचेंगे कि कोराेना के कारण गंभीर संकट में आई केंद्र सरकार और ममता की जीत के कारण खड़े हुए एक चैलेंज के बाद मोदी को मजबूत करना जरूरी हो गया है। ऐसे में मोदी को सपोर्ट करते रहने में ही पूरे संघ परिवार की भलाई होगी।

ये तो बहुत ही स्पष्ट है कि बंगाल की हार से भी ज्यादा कोविड का संकट गहरा है और अगर मोदी सरकार 15 दिनों के अंदर ऑक्सीजन सप्लाई और हॉस्पिटल की व्यवस्था सही नहीं कर पाई तो मोदी क्या पूरा संघ परिवार भाजपा की शाख को नहीं बचा सकता है। लोकसभा के अगले चुनाव 2024 में होने हैं इसे नजर में रखते हुए नरेंद्र मोदी और अमित शाह को आज बंगाल की हार से हुआ दुख केरल में राहुल गांधी और कांग्रेस की हुई हार से मिले सुख से कम ही होगा।

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