विषम भूगोल की बदलती तस्वीर

विजय पपनै।। उत्तराखंड राज्य का गठन इस पर्वतीय क्षेत्र के वासियों की लंबी मांग के बाद 9 नवंबर  सन 2000 को हुआ तब किसी ने यह नही सोचा था कि राज्य में पलायन इस कदर बढ़ेगा यही नहीं राज्य गठन के समय प्रदेश में कुल कृषि का क्षेत्रफल 7.7लाख हेक्टेयर था जिसमे आज 72 हजार हेक्टेयर की कमी दर्ज की गई है जबकि गैर सरकारी आंकड़े और भी अधिक बयाँ करते हैं।

यही नही राज्य घरेलू उत्पाद में कृषि क्षेत्र की कम होती भागीदारी भी चिंता व चिंतन का विषय बन गया है। आज जिस प्रकार खेती का सिस्टम यहां बुरी तरह से बिगड़ गया है जिसका कारण गाँवो से बेतहासा पलायन , जंगली जानवरों का डर , मौसम का प्रतिकूल होना, सिचाई साधनों का अभाव , सरकारी विभागों की गावों के प्रति बेरुखी एक कारण है जिसको पार पाना सबसे बड़ी चुनोती है।

खैर जिस प्रकार सरकार ने खेती की बिगड़ती तस्बीर को बदलने की जो ठानी है वह समय ही बताएगा लेकिन यह साफ है। कि यहां जिस प्रकार सीढ़ीनुमा खेतों में जब तक केचकबंदी सिस्टम लागू नहीं हो पायेगा सम्भवतः उन दुरूह पहाड़ी दूर दराज के किसानों का पलायन किसी भी सूरत में कम नही होगा चाहे कैसी ही नीति नियोजन की जाए नई नीति के तहत जिस प्रकार वर्षा जल संचयन की बात हो रही है।

यह ठीक है उन बिखरे हुए खेतों को संगठित करने की कवायत करने की अवश्य सरकार को सोचना चाहिए जिससे किसानों व कृषि की दशा सुधारने की दशा सुधारने की दशा में उठाये जाने वाले सभी कदम दूरदर्शी हों व उन लोगो में अपनी जमीन के प्रति जागरूकता पैदा हो जो बेरुखी रखे हुए हैं।

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