तारों में उलझी दुनिया..


विजय पपनै।। अमेरिकी  लेखक एलन लाइटमैन की इस बात की चिंता  सार्थकता  से   भरी है कि आज किस प्रकार हमारे हमारे बच्चों के बीच आसपास तारों का गैजट का जाल फैला हुआ है खुद के लिये हम कुछ लम्हे नही निकाल पा रहे हैं।

यह प्रत्यक्ष रूप से हमारी जिंदगी में दखल है जिससे हम खुद को जानने पहचानने व  , प्रकृति से दूर होते जा रहे हैं इन तारों की दुनियां यानी मोबाइल लेपटॉप टीवी ने हमने खुद से नाता तोड़ दिया है जिससे चिंतन मनन की प्रक्रिया समाप्त हो गई है।

हम एक ग्लोबल मशीन बन रहे हैं। एक तरह की बेवजह की आपाधापी वाली दौड़ में शामिल हो रहे हैं अब सवाल की क्या हमारा घर स्कूल , आफिस आदि में हमे अपने दिमाग मे कुछ समय के लिए इन उपकरणों को कुछ समय के किये रोज दूर रहने की आदत नही डालनी चाहिए क्या ? व योग प्राणायाम, ध्यान आदि का नियमित अभ्यास के कुछ सफल फार्मूले अपनाने की कवायत करनी चाहये जिससे यह वक्त हमारे लिए, हमारी आत्मा के किये एक नायाब तोहफा होगा।

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