Sunday, June 23, 2024
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Agnipath Scheme: क्या अग्निवीर योजना बनेगी मोदी 3.0 के गले की फांस? इन राज्यों ने बना लिया ‘इज्जत’ का सवाल

असल न्यूज़:18वें लोकसभा चुनाव में अग्निपथ योजना प्रमुख मुद्दा बन कर उभरी। 2022 में योजना के लागू होने के बाद से ही कांग्रेस नेता राहुल गांधी इस योजना को लेकर मोदी सरकार पर जमकर हमलावर रहे। हरियाणा, राजस्थान, पंजाब और यूपी में भाजपा की सीटें घटने की वजह अग्निवीर योजना को लेकर युवाओं की नाराजगी भी है। वहीं, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में भले ही भाजपा ने सभी सीट ली हों, लेकिन 2019 के मुकाबले वोट शेयर घट गया है। लेकिन क्या मोदी 3.0 में सरकार इस योजना को वापस लेगी? एनडीए के घटक दलों में शामिल जेडीयू ने सरकार बनने से पहले ही इस योजना को लेकर अपनी आवाज मुखर कर दी है। जिसके बाद माना जा रहा है कि सरकार इस योजना को लेकर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर हो सकती है।

14 जून 2022 में संसद में बहुमत वाली मोदी सरकार ने जब अग्निपथ योजना को लागू किया था, उसके बाद से ही युवाओं में नाराजगी बढ़ गई। आर्मी भर्ती की तैयारी कर रहे युवाओं ने इस योजना का जमकर विरोध किया था। रेलें रोकी गईं, वाहन फूंके गए, सड़कों पर खूब प्रदर्शन हुए, करोड़ों की संपत्ति की संपत्ति खाक हुई, लेकिन सरकार इस योजना को वापस लेने के लिए तैयार नहीं हुई। सेना के रिटायर्ड अफसरों ने भी इस योजना को लेकर सरकार की जमकर आलोचना की, लेकिन सरकार ने अग्निपथ योजना को वापस नहीं लिया। राहुल गांधी ने इस योजना को न केवल विधानसभा चुनावों बल्कि लोकसभा चुनावों में प्रमुख मुद्दा बनाया। कांग्रेस ने अपने न्याय पत्र में वादा किया कि सरकार बनने पर वे इस योजना को हटा देंगे।

जेडीयू ने कहा, योजना पर पुनर्विचार की जरूरत
अब जब लोकसभा चुनावों में भाजपा बहुमत से कम सीटें मिली हैं और उसे जेडीयू और टीडीपी के सहारे सरकार बनानी पड़ रही है, तो यह योजना एक बार फिर विवादों के केंद्र में आ गई है। जेडीयू नेता केसी त्यागी ने अग्निपथ योजना को लेकर कहा कि अग्निवीर योजना को लेकर काफी विरोध हुआ था। चुनाव में भी इसका असर देखने को मिला है। इस पर पुनर्विचार की जरूरत है। जो सुरक्षाकर्मी सेना में तैनात थे, जब अग्निवीर योजना चलाई गई, तो बड़े तबके में असंतोष था। मेरा मानना है कि उनके परिवार ने चुनाव में विरोध किया। इस योजना पर नए तरीके से विचार करने की जरूरत है। इसकी वजह बिहार विधानसभा चुनाव को माना जा रहा है, जो अगले साल अक्तूबर-नवंबर में प्रस्तावित हैं। जब यह योजना आई थी तो बिहार में सैन्य भर्ती की तैयारी कर रहे युवाओं ने काफी बवाल किया था, हालांकि उस समय तो नीतीश कुमार ने चुप्पी साध ली थी, लेकिन बिहार विधानसभा चुनाव को देखते हुए उनके इस बयान को काफी माना जा रहा है।

वापस आए पुरानी योजना
वहीं रिटायर्ड लेफ्टिनेंट कर्नल अनिल दुहून का कहना है कि इस योजना में कई तरह की समस्याएं हैं और इसे किसी भी तरह से बदलकर ठीक नहीं किया जा सकता। इस योजना को खत्म किया जाना जरूरी है और इसकी जगह पुरानी, टाइम टेस्टेड योजना को वापस लाया जाना चाहिए। जो हमारे सुरक्षा बलों की यथास्थिति बनाए रखने के लिए बेहद जरूरी है।

योजना को लेकर अफसरों ने सरकार को बनाया मूर्ख!
रिटायर्ड मेजर जनरल सीएम सेठ भी इस योजना को लेकर खुश नहीं हैं। वह कहते हैं कि अग्निवीर योजना के तहत सेना को सबसे अधिक सैनिक देने वाले राज्यों- राजस्थान, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, महाराष्ट्र और पंजाब में भाजपा को खासी चोट पहुंची है। उन्होंने कहा कि अगर भाजपा आने वाले विधानसभा चुनावों में अच्छा प्रदर्शन करना चाहती है, तो इस योजना को रद्द कर देने में ही भलाई है। वह कहते हैं कि सेना के शीर्ष अफसरों ने इस योजना को लेकर सरकार को मूर्ख बनाया है और अब चेतने का समय है।

पंजाब में अग्निवीर योजना का विरोध
मेजर जनरल (रि.) सीएम सेठ का यह कहना काफी हद तक सही है कि राजस्थान, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, महाराष्ट्र और पंजाब, जहां भाजपा की सीटें पहले के मुकाबले घटी हैं और भाजपा को बहुमत पाने से रोक दिया है, सबसे ज्यादा सैनिक देने वाले राज्य हैं। तीनों सेनाओं में तीन लाख से अधिक सैन्य कर्मी पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश से हैं। इन राज्यों में पूर्व सैनिकों की संख्या लगभग 6.20 लाख है। वहीं, उनके परिवार के सदस्य भी मतदाता सूची में हैं। ऑल-इंडिया डिफेंस ब्रदरहुड के प्रदेश अध्यक्ष और रक्षा सेवा कल्याण के पूर्व निदेशक ब्रिगेडियर केएस काहलों (सेवानिवृत्त) कहते हैं, “पंजाब के ग्रामीण इलाकों के युवा सेना में भर्ती के लिए लालायित रहते हैं। लेकिन अग्निवीर योजना आने के बाद नौकरी की अनिश्चितता और रोजगार के सीमित अवसरों के चलते उन्होंने भाजपा को वोट नहीं दिए और पंजाब में भाजपा की सीटें जीरो हो गईं।”

हरियाणा में घटीं सीटें
हरियाणा में सेना में भर्ती के लिए अग्निपथ योजना की शुरूआत लोकसभा चुनाव में भाजपा की सीटें कम होने की प्रमुख वजह रही है। हरियाणा में भाजपा सीटें 10 से घटकर 5 हो गईं और वोट शेयर 58.20 फीसदी से घटकर 46.11 फीसदी हो गया। हरियाणा के युवा को बेरोजगारी का सामना करना पड़ रहा है। हरियाणा के युवा अब अग्निपथ योजना के तहत होने वाली भर्ती में हिस्सा नहीं ले रहे हैं। युवा अब पहले की तरह सुबह सड़कों पर दौड़ लगाते नहीं दिखाई देते। स्थानीय युवाओं के साथ-साथ बुजुर्गों को भी लगता है कि इस योजना के आने के बाद उनका सैन्य सेवा करने का सम्मान उनसे छीन लिया गया है और इसे एक अस्थायी नौकरी में बदल दिया गया है।

सेना में भर्ती के लिए मशहूर शेखावटी में लगा झटका
इस योजना की वजह से भाजपा को राजस्थान के जाट बहुल्य शेखावटी इलाके में भी करारा झटका लगा है। यहां की तीनों सीटें सीकर, चूरू और झुंझुनूं सीट कांग्रेस ने छीन ली हैं। ये तीनों जिले सेना में भर्ती के लिए मशहूर हैं। झुंझुनूं को देश को सर्वाधिक सैनिक देने वाला जिला कहा जाता है। सीकर और चूरू में भी सैनिकों और पूर्व सैनिकों की काफी तादाद है। राजस्थान में भाजपा की सीटें 24 से घटकर 14 रह गईं। दौसा के रहने वाले हनुमान कहते हैं, “गांव से हर साल देश की सेना में किसी न किसी परिवार से युवा का चयन होता था, जिससे सभी युवा साथियों में चयन को लेकर एक अलग ही जोश हुआ करता था। लेकिन अग्निवीर योजना आने के बाद वही युवा नशे/गलत दिशा की ओर अग्रसर हो रहे हैं। इस बार सभी ने अग्निवीर के विरोध और किसानों के हित में मतदान किया। इसलिए वादे के अनुरूप तेजाजी महाराज के मंदिर पर पूरे गांव को उन्होंने लड्डू बटवाएं।”

हिमाचल-उत्तराखंड में घटा वोट प्रतिशत
वहीं, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड की बात करें, तो भले ही भाजपा ने हिमाचल प्रदेश में चारों सीटें जीत ली हों, लेकिन वोट शेयर 2019 के मुकाबले 69.70 फीसदी से घटकर 56.44 फीसदी हो गया। जबकि उत्तराखंड में पांचों सीटें जीतने के बाद भी वोट शेयर 2019 के मुकाबले 61.66 फीसदी से घट कर इस बार 56.81 फीसदी रह गया।

संसदीय स्थायी समिति ने की थी मुआवजा राशि बढ़ाने की सिफारिश
करीब तीन महीने पहले रक्षा मामलों की संसदीय स्थायी समिति ने अपनी एक रिपोर्ट में रक्षा मंत्रालय से सिफारिश की थी कि ड्यूटी के दौरान शहीद होने वाले अग्निवीरों के परिवारों को भी वही लाभ मिलना चाहिए, जो नियमित सैनिक के शहीद होने पर उनके परिवारों को मिलते हैं। रक्षा मंत्रालय ने समिति को सैनिकों को मिलने वाले मुआवजे के बारे में जानकारी दी। जिसके जवाब में स्थायी समिति ने रक्षा मंत्रालय से कहा कि “सरकार सभी हालात में सैनिकों के शहीद होने पर मुआवजे की राशि 10 लाख रुपये तक बढ़ाने पर विचार करे। किसी भी श्रेणी के तहत न्यूनतम मुआवजा राशि 35 लाख रुपये और अधिकतम मुआवजा राशि 55 लाख रुपये होनी चाहिए।”

चार साल से पहले नहीं कर सकते रिटायर
इससे पहले मोदी सरकार में मंत्री रह चुके और मार्च 2010 से मई 2012 तक सेना प्रमुख का पद संभाल चुके जनरल वीके सिंह ने एक साक्षात्कार में कहा था कि अग्निवीरों के पहले बैच के चार साल की सेवा पूरी होने पर अग्निपथ योजना में कुछ बदलाव किए जा सकते हैं। उन्होंने कहा कि अग्निवीरों को जबरन रिटायर नहीं किया जा सकता है और चार साल की सेवा के बाद कुछ बदलाव किए जा सकते हैं।

सरकार भी भांप रही है विरोध को
हालांकि लोकसभा चुनाव को देखते हुए विपक्ष जिस तरह से इसे मुद्दा बना रहा था, तो मोदी सरकार भी इसे भांप रही थी। जिसके बाद रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने बयान दिया था कि अगर जरूरत पड़ी तो स्कीम को रिव्यू कर उसमें बदलाव किया जाएगा। उन्होंने कहा कि स्कीम के तहत भर्ती हुए अग्निवीर उनकी जिम्मेदारी हैं। इससे पहले मार्च में भी एक समिट के दौरान उन्होंने कुछ ऐसे ही संकेत दिए थे। इसके बाद छठवें चरण के चुनाव से पहले सेना के सूत्रों की तरफ से खबर आई कि रक्षा मंत्रालय के तहत आने वाले डिपार्टमेंट ऑफ मिलिट्री अफेयर्स (डीएमए) ने आर्मी, नेवी और एयरफोर्स से अग्निवीरों पर एक आंतरिक सर्वे करा रही है, जिसमें अग्निवीरों से जुड़े सवाल पूछे जा रहे हैं। इसका मकसद भर्ती प्रक्रिया पर योजना के असर को जानना है। सरकार की तरफ से संकेत दिए गए कि इस योजना के परमानेंट किए जाने वाले अग्निवीरों की संख्या को 25 से बढ़ा कर 50 फीसदी किया जा सकता है।

 

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