Friday, May 8, 2026
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700 साल पुरानी परंपरा: रायबरेली के डलमऊ में होली पर नहीं खेलते रंग, 28 गांवों में मनाया जाता है मातम

रायबरेली। जहां पूरे देश में होली का त्योहार रंग, उमंग और उत्साह के साथ मनाया जाता है, वहीं उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले के डलमऊ क्षेत्र में होली के दिन मातम पसरा रहता है। यहां के 28 गांवों में लोग होली पर रंग खेलने के बजाय शोक मनाते हैं। यह परंपरा करीब 700 वर्ष पुरानी एक ऐतिहासिक घटना से जुड़ी हुई है।

स्थानीय निवासी सूर्यकांत मिश्रा के अनुसार, यह घटना डलमऊ के तत्कालीन राजा महाराज डल देव से जुड़ी है। कहा जाता है कि एक बार राजा डल देव गंगा नदी में नौका विहार कर रहे थे, उसी दौरान जौनपुर के शासक शाह शर्की की पुत्री सलमा भी वहां मौजूद थीं। दोनों के बीच प्रेम हुआ और राजा डल देव उन्हें अपने महल ले आए। यह बात जौनपुर के शासक को नागवार गुजरी।

बताया जाता है, कि बदला लेने के लिए कई बार डलमऊ किले पर आक्रमण किया गया, लेकिन सफलता नहीं मिली। इसके बाद मानिकपुर के राजा माणिक चंद्र से गुप्त जानकारी लेकर होली के दिन हमला करने की योजना बनाई गई। क्योंकि उस दिन राजा अपनी प्रजा और सैनिकों के साथ उत्सव में व्यस्त रहते थे।

होलिका दहन के दिन मुगल सेना ने डलमऊ पर आक्रमण कर दिया। राजा डल देव ने अपने लगभग 200 सैनिकों के साथ 2000 की विशाल सेना का डटकर मुकाबला किया, लेकिन वीरगति को प्राप्त हुए। अपने राजा की शहादत की स्मृति में आज भी डलमऊ तहसील क्षेत्र के 28 गांवों में होली के दिन शोक मनाया जाता है।

स्थानीय दुकानदार दीपक श्रीवास्तव बताते हैं कि इस दिन महिलाएं श्रृंगार नहीं करतीं और गांवों में सन्नाटा पसरा रहता है। चार दिन बाद यहां होली का पर्व मनाया जाता है।

इतिहासकार डॉ. आर.बी. वर्मा के अनुसार, डलमऊ तहसील क्षेत्र के मुर्शिदाबाद, नाथखेड़ा, पूरे नाथू, पूरे गड़रियन, नेवाजगंज सहित 28 गांवों में यह परंपरा आज भी कायम है। यह केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि अपने शहीद राजा को श्रद्धांजलि देने का दिन है।

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