अजय शर्मा: खामपुर गांव में खेती की जमीन पर बने एक अवैध गोदाम को लेकर डीडीए (DDA) की कार्रवाई अब सवालों के घेरे में आ गई है। आरोप है कि विभाग ने तोड़फोड़ की कार्रवाई के नाम पर केवल लीपापोती की और पूरा ढांचा हटाने के बजाय अधूरी कार्रवाई कर लौट गया।
स्थानीय सूत्रों के अनुसार, करीब ढाई हजार गज में बने इस गोदाम का निर्माण अवैध रूप से किया गया था। निर्माण के दौरान DDA विभाग द्वारा गोदाम संचालक को छह बार नोटिस भेजे गए, लेकिन हर बार नोटिस को नजरअंदाज करते हुए निर्माण कार्य जारी रखा गया। अंततः गोदाम पूरी तरह तैयार कर किराए पर भी दे दिया गया।
मंगलवार को DDA की टीम भारी पुलिस बल के साथ गोदाम को ध्वस्त करने पहुंची। लेकिन मौके पर हालात अचानक बदल गए। आरोप है कि गोदाम मालिक ने मौके पर मौजूद अधिकारियों से बातचीत शुरू की, जिसके बाद कार्रवाई का रुख नरम पड़ गया।
प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि तोड़फोड़ दस्ते ने केवल कुछ हिस्सों में मामूली कार्रवाई की और फिर बिना पूरी कार्रवाई किए ही वापस लौट गया। इस पूरे घटनाक्रम ने विभाग की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
बड़े सवाल:
जब अवैध निर्माण स्पष्ट था, तो पूरी कार्रवाई क्यों नहीं की गई?
मौके पर ऐसा क्या हुआ कि DDA की टीम अधूरी कार्रवाई कर लौट गई?
क्या अधिकारियों और गोदाम मालिक के बीच साठगांठ हुई?

तस्वीरों में दिखाई दे रहे दो DDA कर्मचारियों की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। स्थानीय लोगों का कहना है कि इन्हीं अधिकारियों की जिम्मेदारी थी कि कार्रवाई निष्पक्ष और पूरी तरह से हो, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
सूत्रों के मुताबिक, यह गोदाम किसी बड़े राजनीतिक व्यक्ति से जुड़ा है.
मांग:
स्थानीय निवासियों और सामाजिक संगठनों ने इस मामले में उच्च स्तरीय जांच की मांग की है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि कार्रवाई अधूरी क्यों छोड़ी गई और इसमें किसकी जिम्मेदारी है।

