असल न्यूज़: देश की राजधानी दिल्ली एक बार फिर महिलाओं के लिए सबसे असुरक्षित महानगर बनकर सामने आई है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की ‘क्राइम इन इंडिया 2024’ रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली लगातार चौथे साल महिलाओं के खिलाफ अपराधों में देश के सभी बड़े शहरों में शीर्ष पर रही है।
हालांकि रिपोर्ट में कुल अपराधों में गिरावट दर्ज की गई है, लेकिन महिलाओं और बच्चों के खिलाफ बढ़ते अपराधों ने राजधानी की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
महिलाओं के खिलाफ 13 हजार से ज्यादा मामले
NCRB के आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2024 में दिल्ली में महिलाओं के खिलाफ कुल 13,396 मामले दर्ज किए गए। इनमें बलात्कार, अपहरण, घरेलू हिंसा, छेड़छाड़ और यौन उत्पीड़न जैसे गंभीर अपराध शामिल हैं।
सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि दिल्ली में 1,058 रेप के मामले दर्ज हुए, जो जयपुर और मुंबई जैसे महानगरों से दोगुने से भी ज्यादा हैं।
- जयपुर में 497 मामले
- मुंबई में 411 मामले
दर्ज किए गए।
गैंगरेप और हत्या के मामलों में भी दिल्ली आगे
रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली में गैंगरेप या रेप के बाद हत्या जैसे जघन्य अपराधों के 6 मामले दर्ज हुए। वहीं POCSO एक्ट के तहत बच्चों से जुड़े 1,553 मामले सामने आए, जो मुंबई से भी अधिक हैं।
अपहरण और घरेलू हिंसा के आंकड़े भी डराने वाले
दिल्ली में महिलाओं के अपहरण और जबरन ले जाने के 3,974 मामले दर्ज किए गए। इसके अलावा:
- पति या रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता के 4,647 मामले
- छेड़छाड़ के 755 मामले
- यौन उत्पीड़न के 316 मामले
- स्टॉकिंग के 178 मामले
भी दर्ज हुए हैं।
बच्चों की सुरक्षा भी बड़ी चुनौती
राजधानी में बच्चों के खिलाफ अपराधों के 7,662 मामले दर्ज किए गए हैं। NCRB रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली में प्रति एक लाख बच्चों पर अपराध दर 138.4 है, जो राष्ट्रीय औसत 42.3 से कहीं ज्यादा है।
चार्जशीट दाखिल करने की दर भी केवल 31.7 प्रतिशत रही, जबकि राष्ट्रीय औसत 61.4 प्रतिशत है।
पुलिस क्या कह रही है?
पुलिस अधिकारियों का कहना है कि दिल्ली में अपराध के अधिक आंकड़े बेहतर रिपोर्टिंग और बढ़ती जागरूकता का परिणाम भी हैं। हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा को लेकर अभी भी बड़े स्तर पर सुधार की जरूरत है।
NCRB रिपोर्ट ने फिर दिखाया आईना
रिपोर्ट साफ संकेत देती है कि राजधानी में कानून व्यवस्था को और मजबूत करने की जरूरत है। केवल अपराध के आंकड़ों में कमी आने से सुरक्षा की भावना पैदा नहीं होती। महिलाओं और बच्चों के लिए सुरक्षित माहौल बनाने के लिए ठोस कदम उठाना बेहद जरूरी है।

