असल न्यूज़: राजधानी दिल्ली में भूजल संरक्षण को लेकर सरकारी दावे और जमीनी हकीकत के बीच बड़ा अंतर नजर आ रहा है। एक ओर सरकारी विभाग हजारों भवनों में वर्षा जल संचयन (रेन वाटर हार्वेस्टिंग) प्रणाली स्थापित होने का दावा कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर द्वारका, नजफगढ़, महरौली, छतरपुर, पूर्वी और दक्षिण-पश्चिम दिल्ली के कई इलाके आज भी गंभीर भूजल संकट से जूझ रहे हैं।
केंद्रीय भूजल बोर्ड (सीजीडब्ल्यूबी) के अनुसार, दिल्ली की 34 भूजल आकलन इकाइयों में से 13 “ओवर-एक्सप्लाइटेड” और 12 “क्रिटिकल” श्रेणी में हैं। ओवर-एक्सप्लाइटेड का अर्थ है कि जितना भूजल प्राकृतिक रूप से रिचार्ज हो रहा है, उससे अधिक मात्रा में उसका दोहन किया जा रहा है। वहीं क्रिटिकल श्रेणी उन क्षेत्रों को दर्शाती है जहां भूजल स्तर चिंताजनक स्थिति में पहुंच चुका है।
दिल्ली जल बोर्ड, (डीजेबी) और अन्य सरकारी एजेंसियों के आंकड़ों के मुताबिक राजधानी के लगभग 9,148 सरकारी भवनों में से 7,596 भवनों में वर्षा जल संचयन प्रणाली स्थापित की जा चुकी है। इसके अलावा 500 नए सिस्टम विकसित किए जा रहे हैं, जबकि 1,000 पुराने सिस्टम को पुनर्जीवित करने की प्रक्रिया जारी है।
हालांकि इन आंकड़ों के बावजूद दिल्ली में भूजल स्तर लगातार गिर रहा है, विशेषज्ञों का कहना है कि केवल संरचनाओं की संख्या बताना पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह जानना अधिक महत्वपूर्ण है कि ये सिस्टम वास्तव में कितना वर्षा जल जमीन तक पहुंचा रहे हैं।
हर साल होने वाली बारिश, का बड़ा हिस्सा अब भी नालों और यमुना नदी में बह जाता है। ऐसे में हजारों सरकारी भवनों में स्थापित रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम की प्रभावशीलता पर सवाल उठ रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इन प्रणालियों की नियमित निगरानी, तकनीकी मूल्यांकन और पारदर्शी ऑडिट के बिना इनके वास्तविक परिणामों का आकलन संभव नहीं है।
सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार दिल्ली के 4,861 स्कूलों, कॉलेजों और अन्य शैक्षणिक संस्थानों में से 4,343 संस्थानों में वर्षा जल संचयन की व्यवस्था मौजूद है। इसी तरह 150 से अधिक सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य संस्थानों में भी ऐसे सिस्टम स्थापित किए गए हैं।
लेकिन इन व्यवस्थाओं की वास्तविक कार्यशीलता को लेकर कोई एकीकृत ऑडिट रिपोर्ट उपलब्ध नहीं है। यह स्पष्ट नहीं है कि कितनी संरचनाएं पूरी क्षमता के साथ भूजल रिचार्ज कर रही हैं और कितनी केवल सरकारी रिकॉर्ड का हिस्सा बनकर रह गई हैं।
यही कारण है कि जिन इलाकों में सरकारी स्कूल, अस्पताल और अन्य संस्थानों में रेन वाटर हार्वेस्टिंग संरचनाएं मौजूद हैं, वे क्षेत्र आज भी भूजल संकट वाले क्षेत्रों की सूची में शामिल हैं।
जल विशेषज्ञों का कहना है, कि प्रत्येक सरकारी विभाग को अपने परिसरों में स्थापित वर्षा जल संचयन प्रणालियों का वार्षिक भौतिक सत्यापन कराना चाहिए और उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक करनी चाहिए। इससे न केवल पारदर्शिता बढ़ेगी बल्कि यह भी स्पष्ट हो सकेगा कि सरकारी दावों का वास्तविक लाभ भूजल संरक्षण में कितना मिल रहा है।

