असल न्यूज़: सरदारपुर के राजगढ़ में इन दिनों एक अनोखा वैज्ञानिक विवाद छिड़ गया है। यहाँ स्थित श्री शनि-शीतला मंदिर परिसर का विशाल वटवृक्ष,जो स्थानीय आस्था का केंद्र है,अपनी आयु को लेकर प्रशासनिक पहेली बन गया है।
वन विभाग की टीम ने निरीक्षण में इस वृक्ष की परिधि 5.2 मीटर मापी, और एक मानक गणितीय फॉर्मूले के आधार पर इसकी आयु मात्र 137 वर्ष घोषित कर दी। यह रिपोर्ट जैसे ही सामने आई, राजगढ़ में हड़कंप मच गया क्योंकि मंदिर से जुड़ी मान्यताओं और ऐतिहासिक दावों के अनुसार यह वटवृक्ष 300 वर्ष से भी अधिक प्राचीन है।
सामाजिक कार्यकर्ता अक्षय भंडारी, ने विभाग की इस गणना को अधूरा और भ्रामक बताया है। उनका कहना है कि केवल परिधि मापकर किसी प्राचीन वृक्ष,खासकर बरगद की सही आयु का पता नहीं लगाया जा सकता। भंडारी की मांग है कि आयु निर्धारण के लिए रेडियो कार्बन डेटिंग जैसी आधुनिक वैज्ञानिक पद्धति अपनाई जाए।
इस दावे की पुष्टि मंदिर के पुजारी श्रवण जोशी भी करते हैं, जोशी परिवार की चार पीढ़ियाँ पिछले लगभग 250 वर्षों से इस मंदिर और वृक्ष की सेवा में समर्पित हैं। उनके अनुसार, उनके परदादाओं के समय यह वृक्ष उतना ही विशाल था, जितना आज है, और इसे महज 137 साल का बताना सदियों पुरानी विरासत के साथ अन्याय है।
अब इस मामले ने एक नीतिगत मोड़ ले लिया है, अक्षय भंडारी ने प्रदेश सरकार से मांग की है कि 100 वर्ष से अधिक पुराने पीपल, बरगद और नीम जैसे सभी वृक्षों को ‘ऐतिहासिक विरासत’ घोषित किया जाए और उनके संरक्षण के लिए एक ठोस नीति बनाई जाए।
राजगढ़ का यह विवाद अब पूरे प्रदेश के लिए एक मिसाल बनता जा रहा है, यह साबित करता है कि स्थानीय जागरूकता ही हमारी अमूल्य प्राकृतिक और सांस्कृतिक धरोहरों को बचाने की पहली सीढ़ी है। फिलहाल, यह देखना दिलचस्प होगा कि वन विभाग अपने गणितीय फॉर्मूले पर अड़ा रहता है या आधुनिक वैज्ञानिक तकनीक को अपनाते हुए इस विरासत की सही उम्र का पता लगाने की पहल करता है।

